Moral Hindi Story- बुद्धिमान और निपुण कौन:

Moral Hindi Story – गुरूजी की बुद्धि परीक्षा

Moral Hindi Story – नगर से बाहर एक आश्रम में पण्डित सुर्यपति अपने शिष्यों को शिक्षा प्रदान करते थे। उनसे पढने के लिए दूर-दूर से विध्यार्थी आया करते थे। पण्डित सुर्यपति अपने समय के बहुत प्रख्यात विद्वान् हुआ करते थे, उनसे पढने बड़े-बड़े राजा-महाराजाओं के बच्चे आया करते थे।

पण्डित जी के एक ही पुत्री थी, जिसे वे बहुत चाहते थे। जब उनकी पुत्री बड़ी हो गयी तो उन्हें उसकी शादी की चिंता हुई। उन्होंने सोचा अपने शिष्यों की परीक्षा लेता हूँ और इनमे से जो सबसे बुद्धिमान और निपुण होगा, उसे ही मैं अपनी पुत्री की शादी की व्यवस्था के लिए कहूँगा, क्योंकि मेरे पास तो इसकी शादी करने के लिए अभी कुछ भी नहीं है।

अगले ही दिन पण्डित सुर्यपति ने अपने सभी शिष्यों को एक स्थान पर इकठ्ठा किया और कहा, “देखो, मैं तुम लोगों का बुद्धि परिक्षण करना चाहता हूँ, यह तो तुम लोगों को पता ही है कि मेरी एक युवा पुत्री है।”

हाँ गुरुदेव, हमें पता है – सभी शिष्यों ने एक साथ कहा

Moral Hindi Story – गुरूजी ने चोरी के लिए रखी शर्त 

“क्योंकि उसकी शादी की उम्र हो गई है तो तुम लोगों को उसकी शादी के लिए कपडे, जेवरात और अन्य सामान की व्यवस्था करनी है, फिर भले ही ये सामान तुम्हे चोरी करके ही क्यों ना लाना पड़े। बस एक शर्त है तुम्हे चोरी करते हुए कोई भी ना देखे। ये चोरी एकदम गुप्त होनी चाहिए। यदि किसी को भी तुम्हारी चोरी के बारे में पता चल गया तो मैं तुम्हारे द्वारा लाया गया सामान स्वीकार नहीं करूँगा।”

गुरूजी की बात सुनकर सभी शिष्यों को लगा, यह अपने आप को सर्वश्रेष्ठ साबित करने का अच्छा मौका है और वो लोग आस-पास के नगरों में जाकर सामान की चोरी करके लाने लगे। चोरी किया हुआ सामान लाकर वो लोग गुरूजी को समर्पित कर देते।

गुरूजी भी अपने हर शिष्य का लाया हुआ सामान अलग-अलग करके रख लेते, जिससे कि बुद्धि –परिक्षण समाप्त होने के बाद ये सामान उनके स्वामियों को लौटाया जा सके। सभी शिष्य अपने कार्य में लगे हुए थे, लेकिन इनमे एक शिष्य ऐसा था जो सबसे अलग उदास सा बैठा रहता, कई दिन बीत जाने पर भी वो कुछ भी चोरी करके नहीं ला सका था। गुरूजी ने उस शिष्य को अपने पास बुलाकर पूछा – “बेटा। क्या बात है? तुम इतने उदास क्यों बैठे रहते हो? इतने दिनों में तुम कुछ भी चुराकर नहीं ला सके हो, जबकि तुम्हारे साथी रोजाना कुछ न कुछ चुराकर मुझे लाकर देते हैं।”

Moral Hindi Story – क्यों भीमसेन कुछ भी ना चुरा सका ?

शिष्य ने कहा – गुरु जी मैं चोरी करने के उद्देश्य से नगर में जाता तो हूँ, पर तभी मुझे आपकी शर्त याद आ जाती है कि ये चोरी पूरी तरह से गुप्त होनी चाहिए और किसी को भी इसके बारे में पता नहीं चलना चाहिए।

गुरूजी ने कहा – हाँ मैंने ऐसी शर्त रखी थी, तो क्या तुम्हे चोरी करते कोई देख लेता है?

शिष्य ने कहा – गुरूजी कोई और देखे या न देखे, लेकिन मेरी आत्मा से तो कुछ छिपाया नहीं जा सकता। मैं चोरी करूँगा तो मेरी आत्मा तो उस चोरी को देखेगी ही।

गुरूजी का चेहरा हर्ष से खिल उठा – “वाह भीम! वास्तव में तुम ही मेरे सर्वाधिक बुद्धिमान शिष्य हो। जो बात मेरे किसी शिष्य को समझ ना आ सकी, उसे तुमने समझ लिया, तुम ही मेरी बेटी के पति बनने योग्य हो।”

Moral Hindi Story- भीमसेन निकला सबसे निपुण और बुद्धिमान 

गुरूजी ने तत्काल सभी शिष्यों को एक जगह इकठ्ठा किया। भीमसेन को उनके सामने खड़ा किया और कहने लगे, “देखो बच्चों! तुम सभी में केवल एक भीमसेन ही सच्चे अर्थों में निपुण और बुद्धिमान निकला है।”

शिष्यों ने इस पर आश्चर्य व्यक्त करते हुए कहा, “गुरूजी! भीमसेन निपुण और बुद्धिमान कैसे हो सकता है? इसने तो आपकी आज्ञा का पालन ही नहीं किया, ये तो इतने दिनों में कुछ भी सामान चोरी करके नहीं ला सका है।”

गुरूजी ने कहा, “हाँ तुम लोग सही कह रहे हो, ये इतने दिनों में कुछ भी चोरी करके नहीं ला सका, लेकिन तुम लोग शायद ये भूल गए कि मैंने चोरी के लिए आप लोगों के सामने एक शर्त भी रखी थी”

हाँ आपने यह शर्त रखी थी कि ये चोरी पूरी तरह से गुप्त होनी चाहिए, इसके बारे में किसी को पता नहीं चलना चाहिए। ये शर्त हमें याद है और हमने इसका पूर्ण रूप से पालन भी किया है।

अब गुरूजी ने कहा “क्या तुम्हारी आत्मा को भी तुम्हारे द्वारा की गई चोरी के बारे में नहीं पता चला।”

Moral Hindi Story – भीमसेन ही समझ पाया गुरूजी की बातों का अर्थ 

“गुरूजी हम अपनी आत्मा से थोड़े ही कुछ छुपा सकते हैं, उसे तो सब पता ही है।” शिष्यों ने जवाब दिया।

इसका मतलब ये हुआ कि चोरी करने की बात गुप्त नहीं रह गई, तुम्हारी आत्मा सबकुछ देख रही थी और यह बात केवल भीमसेन ही समझ सका। इसलिए तुम सब इस बुद्धि परिक्षण में हार गए। – गुरूजी ने कहा

उन्होंने सभी शिष्यों को उनके द्वारा चुराया गया सामान वापस दे दिया और कहा ये सामान जहाँ-जहाँ से चुराया है, उसे उसके मालिक के पास वापस पहुँचा दो।

गुरूजी ने आगे कहा “मैं भीमसेन की बुद्धिमत्ता से बहुत प्रसन्न हूँ, यह मेरी परीक्षा में पूरी तरह से खरा उतरा है और इसलिए अपनी पुत्री का विवाह भीमसेन के साथ करने की घोषणा करता हूँ।”

सभी शिष्यों ने गुरूजी की घोषणा पर ख़ुशी जताई और भीमसेन को बधाई दी।

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