Honesty is the best policy story - संत उमर और ईमानदार चरवाहा

Honesty is the best policy story – संत उमर और ईमानदार चरवाहा

Honesty is the best policy story के बारे में जब सोचते हैं तो बचपन में पढ़ी ईमानदार लकडहारे की कहानी दिमाग में तैर जाती है। लेकिन आज हम ईमानदार लकडहारे के बजाए Honesty is the best policy story में एक ईमानदार चरवाहे की short moral story लेकर आए हैं। ये कहानी भी हमें यही सीख देती है कि Honesty is the best policy. तो चलिए शुरू करते हैं संत उमर और इमानदार चरवाहे की ये कहानी:

सूफी संत उमर बग़दाद के बहुत प्रसिद्ध सूफी संत थे। वे अपने शिष्यों और मिलने आने वाले आगुन्तकों की परीक्षा लेते रहते थे। वे उनसे कुछ ऐसे प्रश्न पूछते थे, जिनका उत्तर देने में उन्हें थोड़ी परेशानी होती थी। जब कोई संतोषजनक उत्तर नहीं मिलता तो फिर संत उमर स्वयं उसका समाधान करते थे। इसके पीछे संत उमर का उद्देश्य परोपकार या लोकहित का सन्देश देना होता था।

संत का ज्ञान :मोह या आसक्ति रखना उचित नहीं

एक बार संत उमर बगदाद स्थित अपने ठिकाने से जंगल की ओर जा रहे थे। रास्ते में उन्हें एक चरवाहा भेड़ – बकरियां चराता हुआ दिखा। संत उमर ने देखा, उसके पास बहुत सारी भेड़-बकरियां हैं। संत ने सोचा, क्यों न इस चरवाहे की परीक्षा ली जाए? वे उस चरवाहे के पास पहुंचे और उससे कहा,”तुम अपनी इन बकरियों में से एक छोटी बकरी मुझे दे दो। मैं इसके बदले में तुम्हे अच्छे पैसे दे दूंगा।”

Honesty is the best policy story

चरवाहे ने अपने मालिक का हवाला देकर कहा, मैं तो एक गुलाम हूँ और इन भेड़-बकरियों को चरा रहा हूँ। मैं इनका मालिक नहीं जो इन्हें आपको बेच सकूँ। तब संत उमर ने कहा, “यदि इतनी बकरियों में से एक कम भी हो जाएगी तो तुम्हारे मालिक को पता नहीं चलेगा। और तुम्हे भी तो इससे कुछ कमाई हो जाएगी।”

लेकिन चरवाहे पर संत उम्र की बातों का कोई असर नहीं हुआ। उसने कहा, “हुजूर! आप कैसी बात कर रहे है? भले मेरा मालिक यहाँ नहीं है, लेकिन ईश्वर जो सारी दुनिया का मालिक है, वह तो मुझे देख रहा है। यदि मैं एक भी बकरी आपको दे दूंगा तो चाहे मेरे मालिक को पता न चले लेकिन उस सबके मालिक को पता अवश्य चल जाएगा। तब उसका मेरे ऊपर विश्वास का क्या होगा? मैं कैसे उसका सामना कर पाउँगा? मैं यह नहीं कर सकता, इसलिए आप मुझे माफ़ करें।”

एक छोटी से अच्छी कहानी – गधा और मज़ार

चरवाहे के उत्तर से संत उमर प्रसन्न हो गए। उनकी परीक्षा में चरवाहा खरा उतरा। संत उमर उसे लेकर उसके मालिक के पास पहुंचे। उन्होंने उसके मालिक को सारा किस्सा सुनाया। वह चरवाहा गुलाम था। उमर ने उसके मालिक से कहा, “तुमने इस खुदा के बन्दे को गुलाम बनाकर बहुत बड़ा जुल्म किया है। जो लाख कहने के बाद भी सैकड़ों बकरियों में से एक भी बकरी देने को राजी न हो, उसकी ईमानदारी को सलाम करना चाहिए और तुमने इसे गुलाम बना रखा है।”

संत उमर के समझाने पर चरवाहे के मालिक ने उसे गुलामी से मुक्त कर दिया और कई बकरियां उपहार में दीं। यह संत उमर के लिए बड़ा अच्छा दिन था। उनका परोपकार का लक्ष्य पूरा हुआ ही, एक छोटे आदमी से बड़ी शिक्षा भी प्राप्त हुई।”

हमें भी जीवन में ईमानदारी को ऐसे ही अपनाना चाहिए। ईमानदारी और मेहनत की कमाई से ही हम सुख की नींद सो सकते हैं। क्योंकि ईमानदारी का जीवन जीकर ही हम खुद का, दूसरों का और ईश्वर का सामना मजबूती से कर सकते हैं।

सूफी संत राबिया – जहाँ प्रेम है वहां नफरत के लिए कोई जगह नहीं 

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