नौकरी......मतलब Self Respect से समझौता

self respect per mirza galib ki kahani:

मिर्जा ग़ालिब की कहानी :

ये सन 1842 की बात है। Delhi College में फ़ारसी के प्रोफेसर का एक पद खाली था। College का secretary ग़ालिब को जानता था, उसने ग़ालिब को प्रोफेसर की नौकरी करने के लिए तैयार किया। ग़ालिब को उस समय पैसों कि जरूरत थी इसलिए किसी तरह वो ये नौकरी करने को ready हो गए। Interview के लिए अपनी पालकी में सवार हो कर गए। पालकी से उतरकर उन्होंने अंदर जाने से इसलिए मना कर दिया क्योंकि वहाँ उनका स्वागत करने के लिए कोई इंतजाम नहीं था।

वहाँ के सेक्रेट्री टॉमसन ने बाहर आकर उन्हें समझाने की कोशिश कि उन्हें Governor के दरबार में पहुँचते वक़्त दिया जाने वाला स्वागत – सत्कार यहाँ College में नहीं दिया जा सकता। इस पर ग़ालिब अपनी जरूरत को भूलकर यह कहते हुए लौट गए कि उनका ख्याल था कि इस नौकरी से उनके रूतबे और हैसियत में इज़ाफ़ा होगा। अगर ये पहले से भी कम होता है तो ऐसी नौकरी ही नहीं करनी। इसके बाद फिर से वही फाका – मस्ती का दौर शुरू हो गया।

Self respect से समझौता करके लिया गया फैसला तात्कालिक रूप से भले ही लाभकारी हों , लेकिन अंततः होते दुखदायी ही हैं।

दोस्तों ये कहानी हमें बताती है कि अगर हम नौकरी करते हैं और उसमे तरक्की भी करना चाहते हैं तो आत्मसम्मान को घर पर छोड़ कर ऑफिस जाना पड़ेगा। और फिर जो भी Boss का आदेश हो उसे तुरंत करते जाइये तो तरक्की निश्चित है लेकिन अगर self respect बचा कर रखना है, आत्मसम्मान से जीना है तो नौकरी छोड़नी पड़ेगी , कुछ और करना पड़ेगा। कुछ और करना इतना आसान तो नहीं, पर आत्मसम्मान की रक्षा के लिए कोई और चारा भी तो नहीं।


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