संत का ज्ञान : मोह या आसक्ति रखना उचित नहीं

Saint Francis संत का ज्ञान – मोह या आसक्ति रखना उचित नहीं:

saint francis

एक बार Saint Francis संत फ्रांसिस के पास एक युवक उनसे मिलने आया। संत ने उससे पूछा, “कहो पुत्र, कैसे हो, क्या हालचाल हैं तुम्हारे?” युवक बोला, “स्वामी आपके आशीर्वाद और ईश्वर की दया से मैं बहुत अच्छे से हूँ, मेरा पूरा परिवार मेरा बहुत ख्याल रखता है, वे सब मुझे बहुत चाहते हैं। मैं अपने आप को बहुत ही भाग्यशाली मानता हूँ, जो मुझे इतना प्यार करने वाला परिवार मिला, मुझे उन पर गर्व है।” संत बोले, “ पुत्र, तुम्हे अपने परिवार पर इतना गर्व नहीं करना चाहिए। इस दुनिया में अपना कोई नहीं होता। जहाँ तक माता-पिता की सेवा, पत्नी-बच्चों के पालन पोषण का संबंध है, उसे कर्तव्य समझकर करना चाहिए। उनके प्रति मोह या आसक्ति रखना उचित नहीं।

युवक बोला, “स्वामी क्षमा करें पर मैं अपने परिवार को लेकर आपकी बात से सहमत नहीं हूँ। आपको शायद विश्वास भी नहीं होगा कि अगर मैं किसी दिन समय पर घर ना पहुँच पाऊं, तो उनकी भूख, प्यास, नींद सब उड़ जाती है। पत्नी तो मेरे बिना जीवित ही नहीं रह सकती।”

संत बोले, “मैं तुम्हे सिद्ध करके दिखा सकता हूँ कि दुनिया में कोई अपना नहीं, बस तुम्हे वही करना पड़ेगा जो मैं कहूँ।” युवक तैयार हो गया। संत ने उससे कहा मैं तुम्हे साँस रोकने की विधि सिखा देता हूँ उसके बाद जब मैं कहूँ उस दिन और समय पर तुम अपने घर में साँस रोककर निश्चेत पड़े रहना बाकि मैं तुम्हारे घर आकर संभाल लूँगा।

संत के कहे अनुसार एक दिन युवक ने ऐसा ही किया। अब युवक की साँस न चलते देख परिवार के लोगों ने उसे निर्जीव मान लिया और घर के सभी लोग मातम मनाने लगे। अपने कहे अनुसार थोड़ी ही देर में संत वहाँ पहुंच गए। एक संत को अपने यहाँ देखकर सब लोग उनके चरणों में गिर पड़े और उनसे उस युवक को फिर से जीवित करने की प्रार्थना करने लगे। संत उनसे बोले आप लोग शोक नहीं करें। मैं इसे जीवित कर सकता हूँ, मगर उसके लिए मेरी एक शर्त है। मैं एक कटोरी पानी में मन्त्र फूंककर दूंगा, वो पानी किसी को पीना पड़ेगा, उस पानी को पीने वाले के प्राण निकल जायेंगे और उसके बदले यह युवक जी उठेगा।

संत की यह बात सुनकर सब एक-दूसरे का मुँह देखने लगे पर पानी पीने के लिए उसके घर का कोई भी सदस्य आगे नहीं आया। तब संत बोले “यदि आप में से कोई भी पानी पीने को राज़ी नहीं है तो मैं ही इसे पी लेता हूँ।” यह सुनकर सभी के चेहरों पर रौनक आ गयी, वे बोले “ महाराज! आप धन्य हैं! सचमुच संत महात्मा परोपकार के लिए ही पैदा होते हैं। आपके लिए जन्म – मृत्यु एक समान है। यदि आप हमारे प्रिय को जीवित कर सकें तो बड़ी कृपा होगी।”

युवक को संत की बात का अर्थ समझ आ गया था। वह उठ कर बैठ गया और बोला “महाराज, आप पानी पीने का कष्ट न करें। सांसारिक संबंध क्षणिक और झूठे होते हैं, यह मैं जान गया हूँ। आपने सचमुच मुझे नया जीवन दिया है।

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Comments

  1. आदिल जी , आपने बहुत ही अच्छी और ज्ञानवर्द्धक कहानी पोस्ट की है. हम आशा करते हैं कि आप आगे भी इसीतरह अच्छी अच्छी कहानियाँ पोस्ट करते रहेंगे. क्रिसमस की आपको हार्दिक शुभकामनाएं.

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