बच्चों की Birthday Party

Tips to live happy life in hindi:

कल 16 January को मेरी बच्ची का birthday था। ये उसका पांचवां जन्मदिन था और इसके लिए घर में एक छोटी सी birthday party रखी गई जिसमे उसके सभी friends को invite किया गया। ये party बच्चों के लिए ही रखी गई थी इसलिए सभी parents अपने बच्चों को एक-एक करके मेरे घर छोड़ के जा रहे थे। इतने बच्चों को एकसाथ deal करने का यह मेरा पहला मौका था क्योंकि इससे पहले की सभी parties में हम बच्चों को parents के साथ ही invite करते थे। पर अब यहाँ trend change हो रहा है अब लोग सिर्फ बच्चों की parties ही कर रहे हैं इसलिए इस बार हमने भी सिर्फ बच्चों को invite करने का decide किया।
मेरा ये पहला मौका किस तरह से मेरे लिए एक अनुभव में बदल गया वही आपके साथ यहाँ share करने जा रहा हूँ। शायद ये अनुभव आपके भी कोई काम आ सके।
सबसे पहले बच्चे ने घर में enter होते ही gift मेरी बच्ची को सौंपा, उसे birthday wish किया और फिर तुरंत ही मेरी तरफ रूख किया और अपना सवाल दाग दिया। uncle खाना कब मिलेगा? मैं अचानक पूछे गए इस सवाल के लिए तैयार नहीं था पर थोडा सोचकर बोला, बेटा अभी आपके और भी friends आने वाले हैं। जब सब बच्चे आ जायेंगे तब आपको खाना मिलेगा। मेरे जवाब से शायद वो संतुष्ट हो गया इसलिए मेरे पास से जाकर, बच्चों के लिए बज रहे गाने पर dance करने लगा। थोड़ी ही देर में दूसरा बच्चा आ गया। उसने भी gift सौंपकर, birthday wish किया और मेरी तरफ रुख कर लिया पर इस बार मैं तैयार था। ये सोचकर कि ये भी खाने के लिए पूछेगा मैं पहले से ही बोला बेटा खाना…………पर वो मुझे बीच में ही टोकते हुए बोला। uncle मेरा return gift क्या है, मुझे जल्दी से दीजिये ना। थोडा सोचकर मैंने उसको जवाब दिया, बेटा अभी cake कटेगा फिर आप खाना खोओगे, उसके बाद आपको return gift मिलेगा। थोड़ी देर में एक बच्ची घर में आई और मेरे पास आकर बोली, uncle मुझे cake बहुत पसंद है, cake कब मिलेगा? उसको भी कुछ समझाकर मैंने दूसरें बच्चों के पास भेजा। ऐसे ही कुछ और बाल-सुलभ सवालों का सामना मैंने किया और अपनी समझ अनुसार सबके सवालों का जवाब देता रहा।
इन बच्चों का मेरे पास आना, मुझे इस तरह के सवाल पूछना, मुझे कुछ सोचने पर मजबूर कर गया कि क्या हम ये कर सकते हैं? जवाब आया नहीं क्योंकि हम समझदार है और ये सोचेंगे कि लोग क्या सोचेंगे? इस “लोग क्या सोचेंगे?” की दुविधा को हमने इतना बड़ा बना लिया है कि हम अपने मन के आधे से ज्यादा काम करते ही नहीं। class में बैठे हैं, teacher ने कुछ समझाया, हमें समझ में नहीं आया पर पूछेंगे नहीं, क्यों? क्योंकि बाकि students क्या सोचेंगे कि इसे ये भी समझ नहीं आया, जबकि वहां 90% से ज्यादा ऐसे ही होंगे जो ये सोच रहे होंगे की मैं पूछूँगा तो बाकी क्या सोचेंगे?
इब इसी बात को एक दूसरे नज़रिए से भी देखते हैं। जब ये बच्चे घर में enter होने के तुरंत बाद इस तरह के सवाल पूछते हैं तो इसका मतलब ये होता है कि इन्हें पता है कि हम birthday party में जा रहे हैं तो वहां अच्छा खाना मिलेगा, cake मिलेगा और return gift भी मिलेगा लेकिन फिर भी सवाल पूछकर confirm हो गए कि मुझे जो चाहिए वो मिल जायेगा और फिर उसके बाद dance करने, खेलने-कूदने में मस्त हो गए। हम अपनी life में बहुत सारे seminars, meetings attend करते हैं जिनमे से ज्यादातर का agenda हमें पहले से पता ही नहीं होता और हम पता करने की कोशिश भी नहीं करते। फिर वहां पहुँच कर एक-दूसरे का मुंह ताकते हैं कि यहाँ होने क्या वाला है? जबकि इन बच्चों की तरह अगर हम पहले ही चीजों के बारे में पता कर ले तो हम भी उस seminar, meeting को enjoy कर सकते हैं।
जब सभी बच्चे इकठ्ठा होकर dance कर रहे थे। तो कई बार एक-दूसरे को धक्का भी लग जाता था। कई बार किसी बात को लेकर आपस में लड़ जाते थे। एक-दूसरे पर हाथ भी उठा लेते। कभी मुझसे शिकायत करते। एक-दूसरे से कट्टा (अब मैं तुमसे बात नहीं करूँगा का symbol) कर लेते। पर मैंने एक बार भी नहीं देखा कि वो एक minute से ज्यादा कट्टा रहे हों। कट्टा होना भी उनके लिए एक खेल जैसा लग रहा था। एक बार एक बच्चे ने दूसरे को धक्का दिया, दूसरा बच्चा रोने लगा। मैं उनके पास गया और धक्का देने वाले बच्चे से कहा, बेटा ये गलत बात है, ऐसे धक्का देने से चोट लग सकती है। उसने फ़ौरन रोने वाले बच्चे से sorry बोल दिया और दोनों बच्चे फिर से साथ खेलने लगे।
अब हम इसे अपने ऊपर लेकर देखते हैं। हमारे जीवन में कितनी बार ऐसा होता है कि अपने दोस्तों, परिवार, समाज या office में किसी ना किसी के साथ खटपट लगी रहती है। हममे से कितने लोग हैं जो सामने से जाकर अपने कट्टा को खत्म करने की कोशिश करते हैं? कितने लोग हैं, जो अपनी गलती महसूस करते हैं? और कितने लोग हैं, जो गलती महसूस करने के बाद sorry बोलने की दिलेरी दिखा पाते हैं? जो ऐसा करते हैं उन सब के लिए मेरी टोपी सिर से उतार कर salute. पर मुझे पता है ज्यादा लोगों के लिए मुझे टोपी नहीं उतरनी पड़ेगी क्योंकि बाकी सब के अंदर का बच्चा कहीं लुप्त हो चुका है। ये बच्चे इसलिए ऐसा कर पाते हैं क्योंकि “अहम् भाव” इन्हें अभी तक छू नहीं पाया है। हमारा अहम् भाव किसी भी दूसरे भाव पर इतना भारी है कि ये हमें तो पहल करने ही नहीं देता और अगर सामने वाला पहल करे तो और बड़ा हो जाता है। अगर सामने वाला हमारे साथ चीजों को सुलझाने की कोशिश करता है तो ये न मान बैठे वो अपनी गलती मानने के कारण ऐसा कर रहा है बल्कि वो ऐसा इसलिए कर रहा हो सकता है क्योंकि वो शायद आपसे प्यार करता है और आपको खोना नहीं चाहता।
आज ये बच्चे बिना अहम् भाव के एक-दूसरे से प्यार करते हैं। लड़ते हैं, झगड़ते हैं फिर एक-दूसरे के साथ खेलने लग जाते हैं पर जैसे-जैसे ये बच्चे बड़े होंगे हम इन्हें इतना अहम् भाव सिखा देंगे कि ये बच्चे भी एक दिन हमारे जैसे हो जायेंगे।
कैसा अजीब है इन बच्चों की अच्छी बातें अपनाने के बजाए हम इन्हें अपनी ऐसी गलत बातें सिखा देंगे, जो इन्हें भी उन्हीं चिंताओं, परेशानियों का सामना कराएगा, जिसका सामना आज हम कर रहे हैं।
दोस्तों अगर हम बच्चों की इन अदाओं को अपना लें या कहें कि अपने अन्दर के बच्चे को फिर से जिन्दा कर लें तो जीवन खुशियों से भर जायेगा और बहुत सारे दुःख, तकलीफ अपने आप ही दूर हो जायेंगे।

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Comments

  1. Rehman Mirza says:

    अगर हम बच्चे बन पाते तो सचमुच ज़िन्दगी बहुत आसान हो गई होती।

  2. अपने अन्दर के बच्चे को कभी मरने मत दे, यही जीवन का मूल महत्व है। सादर…

    नई कड़ियाँ :- अब गूगल फ्लाइट्स पर सर्च करें फ्लाइट

    क्या आप जानते है कि हम फोन करते हुए हैलो (Hello) ही क्यों कहते हैं?"

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