अंधविश्वास और मैं!!!

Superstitions:

अंधविश्वासों (superstitions) से हमारा रिश्ता बचपन से ही जोड़ दिया जाता है। बचपन से ही हमें इस तरह की बहुत सारी घुट्टिया पिलाई जाती है कि काम को कैसे करना शुभ है और कैसे अशुभ है? कोई काम करने से पहले के क्या-क्या शुभ संकेत हैं और क्या-क्या अशुभ संकेत हैं? कौनसा दिन अच्छा है, कौनसा ख़राब है? कौनसी तारीख अच्छी है कौनसी ख़राब है?

कभी-कभी मुझे ऐसा लगता है की हमारे देश में कम-से-कम ये एक चीज ऐसी है जो जात-पात, धर्म-मजहब, अनपढ़ और पढ़े-लिखे के भेदभाव से ऊपर है और मेरे जैसे कुछ भ्रमित लोगों को छोड़कर सभी तबके और status के लोग इन superstitions का भरपूर सम्मान करते हैं।

ऐसे ही कुछ अंधविश्वास पूरे विश्वास के साथ मेरे घर में भी follow किये जाते रहे हैं। इस तरह के विश्वासों की श्रंखला बहुत लम्बी है इसलिए मैं दो ऐसे superstitions के बारे में यहाँ बात कर रहा हूँ जो अमूमन हमारे साथ हो जाते हैं और जिनके लिए मैं अपने घर वालों के साथ बहुत कुतर्क (क्योंकि उनके पास मेरे सवालों के जवाब नहीं है तो Obviously ये उनके लिए कुतर्क ही रहे हैं ) करता रहा हूँ।

पहला अंधविश्वास हिचकी आने से जुड़ा है। जब कभी भी घर में मुझे या किसी को भी हिचकी आती थी तो मेरे मम्मी-पापा एक ही बात बोलते थे कि कोई तुम्हे बहुत दिल से याद कर रहा है। अच्छा अब सोचो कौन याद कर रहा है। अगर तुमने सही guess कर लिया तो अभी हिचकी बंद हो जाएगी। अब ये बात मेरे दिमाग में कभी fit बैठती नहीं थी कि उपरवाले का ये कैसा आधा-अधूरा system है। जिसमे ये तो पता चलता है कि कोई याद कर रहा है पर ये पता नहीं चलता कि कौन कर रहा है और क्यों कर रहा है? क्या उसको मेरी कोई जरूरत है या ऐसे ही बैठे-बैठे याद कर लिया। अब मैं guess करता रहूँ कि कौन याद कर रहा है, क्यों याद कर रहा है और पता नहीं कितने guess के बाद मेरे हिचकी बंद होगी? जब मैं इस तरह की बातें अपने माँ-बाप से करता तो वो मुझे झिड़क देते। अरे तेरा तो दिमाग ख़राब है, बड़े-बुजुर्ग अगर कोई बात कहकर गए हैं तो उसके पीछे कोई कारण है, ऐसे ही नहीं उन्होंने कुछ कह दिया। मैं वो कारण ही तो समझना चाह रहा था पर झिडकी के अलावा कुछ नहीं मिलता।

खैर साहब ऐसे ही दिन बीतते चले गए। अब मैं 12th की परीक्षा दे चुका था और मुझे एक exam देने के लिए शहर से बाहर जाना था। मेरे लिए ये पहला मौका था जब मैं अकेला 3 दिनों के लिए शहर से बाहर रहने वाला था। मैं घर वालों की सारी हिदायतें लिए नए और अनजान शहर की और चल पड़ा। वहां पहुँच कर सबसे पहले रहने की व्यवस्था की। exam center भी एक दिन पहले ही देख कर आ गया मतलब घर वालों की हिदायतों के अनुसार 3 दिन वहां रहकर मैंने अपने exam दिए। ये उस दौर की बात है जब mobile तो दूर की बात है landline भी गिने चुने घरों में हुआ करते थे। हमारे घर में तो कम-से-कम दूर-संचार की कोई व्यवस्था नहीं थी। इसलिए मेरी इन 3 दिनों में घर वालों से कोई बात नहीं हुई।

3 दिन बाद अपने exam देकर मैं घर वापस आ गया और घर पहुँचते ही बैग एक तरफ फेंककर मुँह फुलाकर बैठ गया। मेरा यह व्यवहार देखकर घरवाले एकदम सकते में आ गए और पूछने लगे, क्या हुआ तुझे? तेरा exam तो ठीक हुआ ना! और नहीं हुआ तो कोई बात नहीं, अगली बार अच्छी मेहनत कर लेना। मैंने कहा एग्जाम-वेग्जाम तो सब ठीक है आप तो ये बताओ, मैं पहली बार एक अनजान शहर में अकेले 3 दिन तक रहकर आया और आप लोगों ने मुझे याद तक नहीं किया। माँ ने जवाब दिया तू कैसी बात कर रहा है? हम तो तुझे दिन-रात याद करते थे, तेरे अच्छे exam के लिए दुआ करते थे। खाना खाने बैठते तो तेरा ख्याल आता कि तूने खाया होगा की नहीं, पता नहीं अनजान शहर में कैसा खाना मिल रहा होगा। तू ऐसा कैसे कह रहा है कि हमने तुझे याद नहीं किया। अब मैंने कहा तो इसका मतलब फिर आपने मुझे दिल से याद नहीं किया। मेरे पिताजी बोल पड़े अब माँ-बाप से ज्यादा भी कोई अपने बच्चे को दिल से याद कर सकता है क्या?

अब मैंने अपने असली तीर छोड़ा, “अच्छा !! आप लोगों ने मुझे इतनी बार दिल से याद किया तो फिर मुझे एक बार भी हिचकी क्यों नहीं आई।” अब मेरे पिताजी का पारा चढ़ गया, अरे तेरा दिमाग ख़राब है क्या? हम तो तुझे देखकर घबरा गए की पता नहीं क्या हो गया? और तु ये फालतू की बकवास कर रहा है। मैंने कहा, पापा ये फालतू की बकवास कैसे है? आप ही लोगों का सिखाया हुआ है न कि कोई दिल से याद करे तो हिचकी आती है, तो फिर अगर आप लोगों ने मुझे दिल से याद किया तो मुझे हिचकी क्यों नहीं आयी? उनके पास मेरी बात का कोई जवाब नहीं था। फिर से मुझे झिड़कते हुए वो वहां से चले गए।

दूसरा अंधविश्वास खाना खाते वक़्त गाल कट जाने से जुड़ा है। कई बार खाना खाते हुए मुँह में ऊपर और नीचे के दांतों के बीच गाल की चमड़ी आकर कट जाती है और ऐसे गाल की चमड़ी के कट जाने से बहुत दर्द होता है। इसके लिए मेरे घर में कहा जाता है कि कोई तुम्हारी बुराई कर रहा है, इसलिए तुम्हे ये दर्द झेलना पड़ा। अब मैं उनसे कहता कि अगर उपरवाले ने ऐसा कोई system बना रखा है तो ये तो बड़ा ही लाजवाब है। अगर मेरी किसी से दुश्मनी हो जाये तो मुझे सिर्फ ये पता करना है कि वो खाना खाने किस वक़्त बैठता है। अब सुबह-दोपहर-शाम को जब भी वो खाना खाने बैठे, बस मुझे किसी के पास बैठकर उसकी बुराई करनी है, बाकि का काम आपका ये system कर देगा। जब दिन में 3 -4 बार उसके गाल कटेंगे तो वो खुद इतना परेशान हो जायेगा कि खाना तो खायेगा ही नहीं और जब खाना ही नहीं खायेगा तो इतना कमजोर हो जायेगा की मेरा मुकाबला ही नहीं कर पायेगा। अब घरवाले कहते तेरा तो भेजा ही ख़राब है, ऐसा लगता है कि तू किसी दूसरे गृह से आया है जो बड़े-बुजुर्गों की कहीं बातों की ही काट करता रहता है।

मैं उन्हें यही कहता हूँ किसी भी बात पर आँख बंद करके विश्वास कर लेना कहाँ की समझदारी है। जब हम पढ़े-लिखे हैं तो किसी भी बात पर विश्वास करने से पहले उसकी जाँच-परख तो कर ही सकते हैं पर उनको मेरी बातें समझ नहीं आती और मुझे उनकी।

खैर ये अंधविश्वास ऐसे हैं जिनके मानने या ना मानने से कम-से-कम किसी को कोई फायदा-नुकसान नहीं हैं। हमारे समाज में तो ऐसे-ऐसे अंधविश्वास फैले हुए हैं जो किसी की ज़िन्दगी तक ख़राब कर सकते हैं। ऐसे ही एक अंधविश्वास ने मेरे cousin brother की भी ज़िन्दगी ख़राब की है जिसके बारे में विस्तार से मैं फिर कभी बताऊंगा।

अगर आपका भी है अंधविश्वासों (superstitions) के साथ कोई अच्छा या ख़राब experience है तो वो आप हमारे साथ share कर सकते हैं। आप आपनी post aadil1406@gmail.com पर भेज सकते हैं।

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