बेटी बचाओ अभियान :एक सार्थक कोशिश

Save Girl Child (बेटी बचाओ अभियान):

जब कभी बेटी बचाओ अभियान के बारे में सुनता – पढ़ता हूँ तो अभी हाल में मेरे साथ हुई दो घटनाएँ आँखों में तैर जाती हैं। ये घटनाएँ इस अभियान के शुरू होने से पहले की हैं। पहली घटना एक hospital में हुई और दूसरी मेरे office के बाहर।

मैं अपनी बड़ी बेटी का एक test कराने के लिए hospital गया था। counter के पास बैठा अपनी बारी का इंतज़ार कर रहा था कि hospital के अन्दर से एक young age, पढ़ा-लिखा से दिखने वाला व्यक्ति, बहुत ही उदास सा चेहरा लिए counter पर पहुंचा। उसे देखकर मेरा जो first impression था वो यही था कि लगता है इसके साथ कुछ दुखद घटा है। उस व्यक्ति के पीछे-पीछे hospital का एक कर्मचारी और एक nurse भी counter पर पहुँच गए और उसे बधाई देने लगे। उस बधाई पर आदमी की तरफ से कोई response भी नहीं आ रहा था। मैं भी हतप्रभ था कि ये चक्कर क्या है ? यह आदमी तो बड़ा ही उदास सा नज़र आ रहा है और hospital वाले उसे बधाई दे रहे हैं। तभी वो nurse बोल पड़ी, अरे आपको बेटी हुई है आपको तो खुश होना चाहिए पर बिना कोई response दिए वो आदमी counter पर पैसे जमा कराके चला गया। मुझे उस आदमी की सोच पर बड़ा ही तरस आया। देखने में पढ़ा-लिखा, अच्छे घर का नज़र आ रहा था पर वो दकियानूसी सोच का शिकार होने के कारण बेटी होने पर खुश होने के बजाय लटकाया हुआ चेहरा लेकर घूम रहा था।

ये घटना यहाँ खत्म नहीं हुई। मेरी अचरज का दायरा और बढ़ा गया जब मैंने counter पर खड़े hospital के उन कर्मचारियो की आगे की बाते सुनी। counter पर बैठी महिला ने nurse से पुछा, इस आदमी के पहले भी कोई बच्चा है क्या? nurse ने जवाब दिया, नहीं ये इसका पहला ही बच्चा है। तो counter पर बैठी उस भद्र महिला ने टिपण्णी की “क्या? पहला बच्चा बेटी हुई तो उस पर ये दुखी हो रहा है!!! कैसा पागल है!!! हाँ अगर पहले से बेटी होती और फिर दुबारा बेटी हो जाती तो दुखी होना ठीक भी था।” उस nurse ने भी सहमती में अपना सिर हिला दिया और वहाँ से चली गयी। पर मुझे इन लोगों ने सोचने पर मजबूर कर दिया कि hospital में काम करने वाली दो महिलाओं की सोच यह है कि पहली बच्ची पैदा होने पर दुखी होना बेवकूफी है पर दूसरी भी अगर बच्ची पैदा हो जाये तो दुखी होना ठीक है।

अगर पढ़ी-लिखी महिलाएं भी ऐसी सोच रखेंगी तो क्या बेटी बचाओ अभियान भी बेटियों को बचा पायेगा? ये सवाल मेरे मन को कहीं ना कहीं कचोटता रहता है.

एक दिन मैं अपने office के बाहर सीढियों पर बैठकर धूप का आनंद ले रहा था। तभी हमारा एक सफाई कर्मचारी जो कि उम्र में काफी बुजुर्ग है, मेरे पास आकर बैठ गया। थोड़ी देर आराम करने के बाद वो मुझसे घर परिवार की बातें करने लगा। उसने मुझसे पुछा, “साहब, कितने बच्चे हैं आपके?” मैंने कहा, “दो बच्चे हैं।” उसने कहा, “एक लड़का और एक लड़की होंगे।” मैंने कहा, “नहीं, दोनों लड़कियां हैं।” अब वो अफ़सोस जाहिर करने लगा और बोला, “अरे साहब, दोनों लड़कियां हैं। चलो इस बार हम भगवान् से प्रार्थना करेंगे कि आपको लड़का ही हो।” मैंने कहा, “लेकिन बा (हमारे यहाँ बुजुर्ग व्यक्ति के लिए आदरसूचक संबोधन है) मेरा तो तीसरे बच्चे का कोई इरादा नहीं है।” तो वो कहने लगा अरे साहब कैसी बात कर रहे हैं, लड़का होना तो बहुत जरूरी है घर में। आखिर खानदान को वही बढ़ाएगा और बुढ़ापे में सहारा भी तो वही होगा ना। मैंने कहा बा मेरा खानदान बहुत लम्बा चौड़ा है तो इसे आगे बढ़ाने का बोझ मैंने अपने सिर पर नहीं ले रखा और जहाँ तक बुढ़ापे का सहारा है तो एक बात बताओ आपके कितने बच्चे हैं? उसने कहा, “मेरे चार बच्चे हैं।” मैंने थोडा व्यंग्य किया,“चारों लड़के होंगे।” वो बोला,“नहीं-नहीं साहब, तीन लडकियाँ हैं और एक लड़का” मैंने पूछा कौन क्या करता है? वो बताने लगा कि साहब तीनों लड़कियों की तो शादी कर दी हैं। अपने-अपने घर में तीनों खुश हैं और लड़का तो साहब पिछले साल एक road accident में खत्म हो गया।

मैंने बच्चे की मौत पर अफ़सोस जाहिर किया और पुछा लड़का कितने साल का था? “साहब 19 साल का था वो जब उसकी मौत हुई। घर में सबसे छोटा था।” उसने दुखी मन से जवाब दिया।

मैंने कहा बा एक बात बताओ तुम्हारे तो एक लड़का था, उसको तुमने 19 साल तक पाल-पोष कर बड़ा किया पर भगवान ने उसको अपने पास बुला लिया तो अब कैसे तुम्हारा खानदान आगे बढेगा और कौन तुम्हारे बुढ़ापे का सहारा बनेगा? वो बोला, “अरे साहब, ये तो भगवान की मर्जी थी, इस पर तो किसका क्या जोर” मैंने कहा, “बा ये भी भगवान की ही मर्जी है। भगवान को पहले से ही पता था कि मेरा दो बच्चों का ही इरादा है फिर भी उसने मुझे कथित बुढ़ापे का सहारा नहीं दिया बल्कि बेटियां दी। इसका मतलब वो यही चाहता है कि मैं अपनी दोनों बच्चियों को अच्छे से पाल-पोष कर बड़ा करूँ, उन्हें अच्छी शिक्षा दूँ और उन्हें इस लायक बनाऊ कि वो अपने पैरों पर खड़ी हो सकें।” पर मेरी बात बा को समझ नहीं आई और वो वहां से उठ कर ये कहता हुआ चला गया कि साहब घर में एक लड़का होना तो बहुत जरूरी है।

लड़के की ऐसी चाहत ही हमारे देश के प्रधानमंत्री को “बेटी बचाव अभियान” शुरू करने की जरूरत महसूस कराती है. 
आज देश के हर नागरिक तक ये संदेश पहुँचाना बहुत जरूरी है कि अगर सभी लोग लड़के की चाहत लिए बेटियों को दुनिया में आने से रोकते रहेंगे तो एक दिन उन्हें अपना खानदान बढ़ाने के लिए बेटियां ही नहीं मिलेंगी और ये स्थिति भविष्य में पैदा होने वाली नहीं बल्कि वर्तमान में पैदा हो चुकी है। आज ऐसे बहुत सारे समाज, गाँव हैं जहाँ बेटियां नहीं होने से लड़कों की शादी नहीं हो पा रही है। अभी भी अगर हम लोग नहीं संभले तो ये स्थिति और भयावह हो जाएगी और सिर्फ अपने खानदान की सोचने वाले अनजाने ही पूरी generation को निगल जायेंगे।

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Comments

  1. Devendra Sharma says:

    यह सचमुच बड़े ही दुःख की बात है कि समाज को चलाने वाली बेटियों के लिए बचाव अभियान चलाने पड़ते हैं। हमारे समाज के लोगों की सोच पर बहुत अच्छा आर्टिकल लिखा है आदिल जी आपने।

  2. apke sare lekh mujhe prerit karate hain.

    • Thank you Manish Ji, अपने जीवन के अनुभवों को साझा करने की कोशिश है मेरी ये website. आप ऐसे ही पढ़ते रहें और अपने comment भी जरूर देते रहें.

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