कैसे मैंने अपना एक दिन ख़राब किया?

ये तीन दिन पहले की बात है। जब सुबह के alarm से आँख खुली तो सबसे पहला ख्याल जो दिल में आया वो ये है था कि आज कुछ भी बहाना बनाकर plant से छुट्टी ले ली जाये। पर अफ़सोस छुट्टी नहीं ले सकता था क्योंकि मेरे section में मेरे अलावा एक section incharge, एक मेरा senior, एक junior है और आज तीनों ही छुट्टी पर हैं। आज मुझे अकेले को ही section संभालना है तो छुट्टी मिलने का तो सवाल ही पैदा नहीं होता। अब इतनी सारी उहा-पोह के बाद जब उठा तो ऐसा लगा दिल पर बहुत बड़ा बोझ रखा हुआ है। ऐसा कभी आपके साथ भी होता होगा जब सुबह उठते ही दिमाग upset होता है। कुछ करने का मन नहीं करता। दिल पर कोई बोझ महसूस होता है। ऐसा अपने आप ही नहीं हो जाता, इसके पीछे बीते दिनों के कुछ कारण होते हैं। अब मैं क्यों उस दिन बोझिल मन के साथ उठा, इसके लिए मैं आपको तीन दिन से पहले की कुछ घटनाएँ बताता हूँ।

मेरे section में पिछले कुछ दिनों से breakdowns बहुत बढ़ गए थे, plant ढंग से चल नहीं पा रहा था, daily कोई न कोई छोटा-बड़ा breakdown आ रहा था जिसकी वजह से running hours काफी कम हो गए थे।

मेरी company एक large production unit है, better production and maintenance के लिए इसे कई section में divide किया गया है। हर section का production या maintenance उसके पहले और बाद वाले section की performance से influence होता है। मेरे section के बाद वाले section के मेरे साथी लगातार शिकायत कर रहे थे कि हम उन्हें सही product नहीं दे रहे हैं जिसकी वजह से उनकी machinery की performance down हो गयी है। इसे सुधारने के लिए रोज सुबह हमें मशीनों को start करने से पहले एक काम करना पड़ रहा था, जिसे हमारे technical head ने करने को कहा था। पर इस काम को करने में हमें company के एक safety rule को bypass करना पड़ रहा था और ये matter technical head तक highlighted हो चुका था।

बढ़ते breakdowns और गिरती performance के कारण हमारे technical head ने planning team के एक बन्दे को हमारे section की photographs खीचने के लिए नियुक्त कर दिया। section इतना बड़ा है कि उसको दो दिन लगे पूरा round लेने में, लेकिन भाई ने पूरी तन्मयता दिखाते हुए दो दिन में 150 से भी ज्यादा pictures click कर डाले।

जब मैं सुबह उठा तो ये सब बातें दिमाग में उमड़-घुमड़ करने लगी क्योंकि आज plant review meeting थी, जिसको technical head ही chair करने वाले थे। एक दिन पहले HoD ने फोन करके हिदायत और दे रखी थी, “कल time पर meeting में पहुँच जाना।”

खैर जैसे तैसे बिस्तर छोड़ कर plant जाने के लिए तैयार होने लगा। तैयार होकर बैठा ही था कि गाड़ी लेने आ गयी। गाड़ी में बैठा और सीधे अपनी site पर पहुँच गया। वहां पहुँच कर सब workers को उनके काम पर लगाया और office में आकर बैठ गया। laptop start किया और production report बनाने बैठ गया। ये सब मेरे routine के काम हैं पर आज ऐसा लग रहा था जैसे कोई डंडा मारकर करवा रहा है। दिल में बार-बार एक ही ख्याल आ रहा था कैसे भी करके आज meeting cancel हो जाये नहीं तो आज सबके सामने फटकार खानी पड़ेगी। ये ख्याल मुझे कुछ भी ढंग से नहीं करने दे रहा था। मैं अपने दिमाग को divert करने की भरपूर कोशिश कर रहा था, Internet पर कुछ देर तक लगा रहा, अलग-अलग books में पढ़े हुए विभिन्न तरीके के नुस्खे आजमा रहा था पर कुछ खास सफलता हाथ नहीं लग रही थी।

इसी बीच wife का फोन आ गया, उसने बताया कि बच्ची की पेट में दर्द हो रहा है और वो school जाने से मना कर रही है। मैंने भी कह दिया ठीक है school मत भेजना पर company के hospital में ले जाकर एक बार check करा देना। wife ने फोन रख दिया। अब थोड़ी देर में मेरे दिमाग की बत्ती जली और मैंने सोचा बच्ची की तबियत ख़राब है और उसे city के hospital में दिखाने का कहकर मैं छुट्टी ले लेता हूँ। पर अफ़सोस यहाँ भी मेरी किस्मत ने मुझे धोखा दे दिया। मुझे ये ख्याल जब तक आया तब तक देर हो चुकी थी क्योकि wife का वापस फोन आ गया और उसने बताया कि hospital में दवा पिलाने के 10 minute में बच्ची ठीक हो गयी।

अब meeting का mail आ चुका था। 4:00 बजे सभी को meeting में पहुँचना था। मैंने time देखा तो लगा अभी घडी के साथ साथ मेरी भी 12 बज रही है। इतना upset मैं पिछले काफी समय से नहीं हुआ था। 1:00 बजे में lunch के लिए घर आ गया, lunch करके अखबार पढने बैठ गया। बच्चों ने साथ खेलने की कोशिश की तो उन्हें मना कर दिया। 2:00 बजे फिर से office पहुँच कर maintenance के काम बेमन से कराने लगा। अब जैसे जैसे समय नज़दीक आ रहा था, अन्दर की बैचेनी बढती ही जा रही थी। अधिकतर maintenance के काम से 3:30 बजे तक free हो जाते हैं। आज मुझे ऐसा लग रहा था काश कोई breakdown ही आ जाये तो मैं meeting में जाने से बच जाऊ पर ऐसा कुछ नहीं हुआ। हाँ थोड़ी देर जरूर हुई और free होते-होते 3:50 हो गयी। office में पंहुचा ही था की HoD का फोन आ गया, कहाँ हो? मैंने कहा sir, अभी free होकर office में आया हूँ, आज की report बना रहा हूँ। HoD ने कहा, ठीक है report बनाकर time पर meeting में पहुँच जाना और फोन काट दिया। report बनाते-बनाते 4 बज गयी। laptop बंद किया, office lock किया, गाड़ी में बैठा ही था कि HoD का फिर से फोन, तुम अभी तक पहुंचे नहीं। मैंने कहा sir गाड़ी में बैठ गया हूँ, बस 5 minute में पहुच जाऊंगा। ऐसा लगा जैसे आज तो कोई कहर ही मुझ पर टूटने वाला है।

इस meeting के चक्कर में मैं आज अपना पूरा दिन ख़राब कर चुका था। दिन भर खुद को समझाने की खूब कोशिश की, ज्यादा से ज्यादा क्या होगा, डांट ही तो पड़ेगी, सुन लेंगे, गलती मान लेंगे, इसको सुधारने की कोशिश करेंगे। पर ये सब दिल समझ ही नहीं रहा था। खैर 5 minute में मैं meeting room में था और चुपचाप एक खाली chair देखकर वहां बैठ गया। Meeting शुरू हो गयी, मेरी साँस ऊपर-नीचे हो रही थी। जैसे ही मेरे section का number आया, graph दिखाने लगे कि running hours बहुत कम हो गए है। Technical head ने कहा, हाँ आदिल क्यों कम है running hours? मैं कारण बताने लगा, sir Sunday को सुबह की shift में चलाया था और उसके बाद हर दिन के breakdowns बता दिए। मुझे लगा अब इनका गुस्सा मुझ पर फट ही जायेगा। पर ये क्या, उन्होंने तो मुझसे पहले वाले section के incharge की तरफ देखा और कहा, तूने Sunday को एक shift में क्यों चलाया, इसे maintenance के लिए क्यों नहीं दिया? वो कुछ जवाब देता इससे पहले ही TH बोल पड़े, तुम maintenance के लिए time नहीं दोगे तो breakdowns ही आएंगे ना। मुझे तो ऐसा लगा जैसे मेरे दिल से एक भारी पत्थर उतार दिया गया। तभी मेरा HoD बोल पड़ा sir वो safety का rule bypass हो रहा है, उसके लिए क्या करना है? मेरी साँस फिर से ऊपर-नीचे। पर इस बार TH ने safety head को कहा, मैंने आदिल को सुबह-सुबह ये काम करने को बोला है। इसलिए तुम एक बार site पर जाकर देखो और suggest करो कि कैसे हम safety rule bypass किये बगैर ये काम कर सकते हैं। लो एक और बोझ दिल से इतनी आसानी से उतर गया। plant review खत्म होने के बाद हमारे planning वाले साथी आ गये अपनी photos को पिटारा लेकर। मुझे लगा अब इसमें तो कोई मुझे नहीं बचा पायेगा। उसने photos दिखाने शुरू किये। TH ने मरी तरफ देखा और बड़े ही light अंदाज में मुझे कहा. ये देख ले तेरे section की हालत . अब मुझे बता इसको कितने दिन में वापस भेजू। मैंने कहा sir एक महीने में मैं ये सारे काम complete कर दूंगा। TH ने कहा ठीक है और meeting इसी के साथ खत्म हो गयी।

meeting खत्म होने के बाद मैं TH के पास गया तो उन्होंने मेरे HoD को कहा, तुम इस section की ज़िम्मेदारी आदिल को दो और मेरे senior का नाम लेते हुए बोले, उसे दूसरी ज़िम्मेदारी सौपों। मैं अब मीटिंग से बाहर आ गया था। जिस meeting में ना जाने के लिए मैं सुबह से परेशान था, उस meeting से बाहर निकलते हुए मेरा दिल हिल्लोरे मार रहा था। ये ज़िम्मेदारी मुझे दी जाएगी या नहीं, दी जाएगी तो कब तक, ये तो मुझे नहीं पता पर शाम को बैठकर जब मैंने दिनभर का अपना लेखा-जोखा बनाया तो मुझे हंसी आये बिना नहीं रही। मैंने सिर्फ अपनी इस सोच कि आज meeting में मेरा कचरा किया जायेगा, के कारण आज अपना 4 बजे तक का पूरा time ख़राब कर लिया। जबकि meeting में ऐसा कुछ भी नहीं हुआ बल्कि मुझे वहां कुछ अच्छा सुनने को ही मिला कि अब मेरी जिम्मेदारियां बढाई जा रही है।

दोस्तों ऐसा कितनी बार हमारे साथ होता है। हम किसी situation का analyse अपने हिसाब से कर लेते हैं और उसके परिणामों को सोचकर परेशान होते हैं। जबकि हकीकत में उसका सामना होने पर लगता है, खोदा पहाड़ और निकली चुहिया। इसलिए आप मेरी जैसी गलती करके अपना दिन या एक पल भी ख़राब ना करें। क्योंकि जिसे हम समस्या मान बैठे हैं, हो सकता है हकीकत में वो समस्या हो ही ना।


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