डॉ अब्दुल कलाम (Abdul Kalam) के अनमोल विचार (GUIDING SOULS)

Dr Abdul Kalam Quotes in Hindi from his book GUIDING SOULS:

डॉ अब्दुल कलाम के अनमोल विचार, उनकी किताब हमारे पथ-प्रदर्शक से:

डॉ अब्दुल कलाम (APJ Abdul Kalam) के अनमोल विचार जब उनकी किताबों के जरिये पढने को मिलते हैं तो जीवन जीने की नई राहें दिखाई देने लगती है। जीवन में एक नई उर्जा महसूस होती है। मैं आपको उनकी किताब “GUIDING SOULS”, हिंदी संस्करण “हमारे पथ-प्रदर्शक” पढने की सलाह जरूर दूंगा। यह किताब Abdul Kalam के अनमोल विचारों का संग्रह है। उसी संग्रह में से उनके कुछ अनमोल विचार मैं यहाँ आपके सामने प्रस्तुत कर रहा हूँ।

  • जिस प्रकार सृष्टि के बाह्य संसार के संचालन के लिए कुछ निश्चित नियम हैं, जैसे – गुरुत्व का नियम और वायुगतिकी का नियम; ठीक उसी प्रकार मन के आंतरिक संसार के संचालन के लिए भी निर्धारित नियम हैं। इन नियमों की समझ से जीवन के अनुभवों को बेहतर ढंग से समझा जा सकता है।
  • एक बार अपनी आत्मा के संपर्क में आ जाने पर मनुष्य इस ब्रह्मांड के केंद्रबिंदु के रूप में क्रियाशील हो जाता है।
  • दुनिया में दुःख-दर्द और कठिनाईयों के साथ-साथ प्रेम, सौन्दर्य और आनन्द भी है। जब हम अपने चारों और व्याप्त सौन्दर्य और आनन्द की ओर से अपनी आँखे बंद कर लेते है तो फिर हम कष्ट ही भोगते हैं।
  • मनुष्य जीवन एक साहस भरी अस्मिता है, जिसकी अनुभूति पाने के लिए हमें अपने जीवन के प्रति पारदर्शी बनना ही होगा।
  • वास्तव में पूरा जीवन ही एक पीड़ादायक अंतर्वर्ती यात्रा है, जिसमे अनगिनत कठिनाईयां आती है।
  • आत्मबोध पाने के लिए मनुष्य को तार्किक द्रष्टिकोण का त्याग करना पड़ता है। अल्प क्षमतावाले स्त्रोत पर निर्भरता त्यागकर असीमित क्षमतावाले स्त्रोत की शरण में आना पड़ता है।
  • जीवन सही दिशा में कठोर श्रम और अनुशासन की विषय-वस्तु है।
  • विचार, अनुभूति अथवा कल्पना का उद्गम बाहर से नहीं बल्कि अन्दर से ही होता है। आत्मा में ही इनका स्त्रोत होता है और अंत में आत्मा में ही इनका विसर्जन हो जाता है।
  • मन स्वयं में एक महासागर है, जिसके अन्दर कई रहस्यात्मक, अस्पष्ट रूप से दिखाई देने वाले ब्रह्मांड समाए हुए हैं।
  • यदि हम फ़िल्टर के बिना भीतर झांक सकें तो हम प्रत्यक्ष आत्मदर्शन और आत्मनुभूति कर सकते हैं। जीवन का उद्देश्य कहीं जाना नहीं, बल्कि धूप , चांदनी और मंद समीर का आनन्द लेते हुए बस तैरते जाना है।
  • जीवन का मर्म मन के बुने हुए जाल में फंसकर रह जाना नहीं बल्कि उससे भी बढ़कर एक उद्देश्यपूर्ण जीवन व्यतीत करना है। पानी से भरे हुए बिना पिए प्याले की तरह रह जाना नहीं, किसी की प्यास बुझाना है।
  • जर्मन दार्शनिक फ्रेडरिक नित्शी (Friedrich Nietzsche) कहते हैं ” सत्य तपस्वियों का अनुशासन है, रहस्यवादियों की प्यास है, सामान्यजनों की आस्था है, दुर्बलों की फिरौती है, सज्जनों का मानदंड है, विनयशीलों का सिद्धांत हैं और प्रकृति की चुनौती है।
  • मनुष्य की रचना करने में ईश्वर को लाखों वर्ष लग गए। मनुष्य के भीतर उसने दिव्यात्मा की पवित्रता और निर्मलता तथा शैतान की क्रूरता और छल कपट मिलाकर उसका सृजन किया। उसके बाद उसने मनुष्य को आदेश दिया कि वह अपनी बुद्धि और विवेक-शक्ति का उपयोग करके अपने सही स्वरुप को पहचाने। और यही मनुष्य के जीवन का सही प्रयोजन है।
  • हम में से अधिकांश लोग अपने ज्ञान की व्यापकता उसके पर्याप्त होने की गफलत में जीते हैं। जीवन के आगे आने वाले वर्ष और अनुभव ही हमारे ज्ञान के अधूरेपन का एहसास कराते हैं। हमें यह महसूस कराते हैं कि हमारा व्यक्तिगत ज्ञान संभावनाओं के स्त्रोत के सामने कितने तुच्छ है।
  • जब हमें आत्मा, मन, तत्व एवं वास्विकता के बारे में जानने की आवश्यकता हो तो हम सरलता से उस स्त्रोत की ओर अपना ध्यान केन्द्रित कर सकते हैं। इस अवस्था में निश्चय ही हमें मार्गदर्शन मिलने की अनुभूति होगी।
  • हमारा मूल तत्व कोई विशिष्ट स्थिति अथवा अवस्था नहीं है; ऐसा भी कुछ नहीं है, जो एक पैकेट के रूप में या पुश्तैनी संपत्ति के रूप में हमें मिल गया है। यह एक ऐसा माध्यम और स्त्रोत है, जहाँ से मानव-जीवन की सभी अवस्थाएं और स्थितियां प्रकट होती हैं।
  • हम अपनी आत्मा को गुलाब के फूल के रूप में अनुभव कर सकते हैं, जो अपनी संभाव्यता में अन्तर्निहित स्वरूपों को प्रकट करता हुआ खिलता और विकसित होता है। हमारी आत्मा इस गुलाब की तरह है, जिसमें अनुभूति और विचार अथवा धारणा के रूप में अनगिनत पंखुडियाँ होती हैं।
  • सत्य कि हमारी धारणाएं प्रायः अबोध होती हैं, जो मकड़ी रुपी मन द्वारा बुने हुए अज्ञानता के जाल में आसानी से फंसकर विरूपित हो जाती है।
  • संस्कार बहुरंगी काँच की भांति होते हैं। जिस प्रकार काँच रंगहीन प्रकाश को रंगीन कर देते हैं, उसी प्रकार संस्कार मानव तत्व को रंग देते हैं।
  • हमेशा विनम्र रहिये। ब्रह्मांड को किसी की सेवा की आवश्यकता नहीं है। एक अद्भुत और अलौकिक शक्ति है, जिसमे ब्रह्मांड की रचना की। वह मनुष्य की सहायता से अथवा उसकी सहायता के बिना भी इसका संचालन करती आई है, करती रहेगी। ब्रह्मांड को आपकी सेवा की जरूरत नहीं है; जरूरत तो आपको है उसकी सेवा करने की।
  • पूर्ण और संतुष्ट जीवन व्यतीत करने के लिए मनुष्य को एक स्वप्न रचना चाहिए, एक लक्ष्य निर्धारित करना चाहिए।
  • विचारों में निहित स्वार्थ के कारण हम कुछ नवीन या यथार्थ उपलब्धि हासिल नहीं कर पाते। बस अपने ही द्वारा बुने हुए मायाजाल में फंसकर उसे कोसते जीवन गुजार देते हैं।
  • साधारण समाज, साधारण जीवन ही सबसे अच्छा प्रशिक्षण संस्थान है। आध्यात्मिक द्रष्टिकोण से, दैनिक जीवन में आए विभिन्न आघातों और विपरीत परिस्थितियों को हमें स्वयं को नियंत्रित करने वाले सहायक कारक के रूप में स्वीकार करने की आवश्यकता होती है, न कि उससे बचते भागते हुए स्वयं को सुखद, आरामदायक बनाए रखने की।
  • मेरा तो सदैव ही परिश्रम की पवित्रता में विश्वास रहा है। सार्वभौम शक्ति न तो किसी का पक्ष लेती है और न ही किसी की आलोचना करती है। यह हमारे स्वयं के गुणों के आधार पर हमें स्वीकार अथवा हमारा तिरस्कार करती है।
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  • एक बीज स्वाभाविक रूप से अंकुरित होता है, परन्तु उसी स्थिति में जब उसे जुती हुई भूमि में रखा जाए औए उसके चारों ओर आर्द्रता का अनुकूल वातावरण हो।
  • मनुष्य का मस्तिष्क स्वयं बुद्धिमान नहीं है। यह तो computer की तरह एक यन्त्र भर है, जो मनुष्य द्वारा संचालित होता है। computer की तरह इसमें भी हम programming करते हैं। इसमें program शुरू कीजिए और यह अपना कार्य, अपनी खोज शुरू कर देगा; परन्तु उस खोज का अंतिम परिणाम सदैव program में ही अर्थात मस्तिष्क में ही उपस्थित रहता है। अतः इससे स्पष्ट है कि मस्तिष्क कोई नव-सृजन नहीं करता, बल्कि प्रछन्न संभावनाओं की खोज भर करता है। श्रेष्ठतम मस्तिष्क को भी एक super computer ही कहा जा सकता है। आत्मा programmer है।
  • ऐसा सोचना कि कुछ लोग अन्य लोगों की अपेक्षा अधिक योग्य हैं, गलत है। सारी बात अनुभव पर निर्भर है। किसी के पास कोई गुण अदिव्तीय नहीं होता। जब तक अनुभव शक्ति का स्तर स्थापित नहीं करता है तब तक कायर भी अपने को वीरों से आगे मानते रहते हैं। अनुभव ही अवस्था और भ्रान्ति के मध्य कसौटी कसता है।
  • कहीं किसी प्रकार के उकसावे से प्रेरित या उत्तेजित होने की आवश्यकता नहीं है। अवलोकन और चिंतन-मनन करने में समर्थ आप एक सामान्य सांसारिक व्यक्ति के रूप में सदैव ही बेहतर रहेंगे। प्रतिशोध या बदले का भाव रखना कोरी मूर्खता है।
  • राष्ट्रपति भवन में कई बिल्लियाँ रहती हैं, जो मुग़ल garden में इधर से उधर घूमती रहती हैं। परन्तु यहाँ चारों ओर उपस्थित फूलों और फव्वारों की सुन्दरता की बजाय उनका पूरा ध्यान किसी कबूतर का शिकार करने पर ही रहता है। अर्थात लोग उन्हीं वस्तुओं को देखते हैं, जिन्हें वे देखना चाहते हैं।
  • मन के भीतर झाँकने के लिए ये देखना होगा कि आपका मन कहाँ अटका है। वह आपकी चेतना को किधर खींच रहा है। फिर देखना होगा कि मन की इन इच्छाओं के पीछे क्या अभिप्राय और एजेंडे छिपे हैं। तब निश्चय ही आप यह समझ पाओगे की आपका प्रत्येक प्रयास एक मनो-दैहिक सत्ता द्वारा संचालित होता है। जाँच के बाद तुम्हे ये बोध होगा कि यह उर्जा, जो मनो-दैहिक सत्ता को अक्षुण्ण बनाए रखती है, वस्तुतः तुम्हारे अहं की उर्जा है।
  • विरोधाभास स्वरुप “में” और “मेरा” शांति की इच्छा रखते हैं; परन्तु शांति प्राप्त करने के लिए पहले इसी “में” और “मेरा” के भाव से दूर होना पड़ता है।

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Comments

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  2. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम हम सभी के लिए प्रेरणा स्रोत हैं। उनके अनमोल विचारों को अपना कर हम सभी को जीवन में आगे बढ़ने में मदत मिलेगी।

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